विविध


मनीषा महंत (थर्ड जेंडर) से डॉ. फ़ीरोज़ और डॉ. शमीम से बातचीत

19/12/2016, 4:34 am द्वारा वाङ्मय बुक्स, अलीगढ़ प्रेषित   [ 19/12/2016, 4:35 am अपडेट किया गया ]

15 अप्रैल 2014 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में हिजड़ों को थर्डजेन्डर घोषित किया। ये निर्णय हिजड़ों के लिए ऐतिहासिक है। इस फैसले के साथ प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिजड़ों से संबंधित एक नई बहस शुरू हो गई। इस फैसले के बाद हमारा भी ध्यान इस समुदाय की और खिंचा चला आया। मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि क्यों न इनके बारे में विस्तृत जानकारी की जाए। इसके लिए हमने बहुत-सी किताबों के पन्ने पलटे और बहुत कुछ पत्रा-पत्रिकाओं को एकत्रित किया। लेकिन इन सभी से बहुत भ्रान्तियाँ भी उत्पन्न हो गई। हमने सोंचा कि क्यों न किसी थर्डजेन्डर का इन्टरव्यू लिया जाए। इस सन्दर्भ में हमने कई थर्डजेन्डरों से मुलाकात की लेकिन किसी से बात नहीं बन पाई। इसका मुख्य कारण ये था कि वह पढे़-लिखे बिल्कुल नहीं थे और इन्टरव्यू देने से घबरा रहे थे। लेकिन हम लगातार प्रयास करते रहे तो हमें इन्टरनेट से मन्नू महंत (मनीषा महंत किन्नर) को मोबाईल नम्बर मिल गया है। फोन से उनसे बातचीत हुई और वो इन्टरव्यू देने के लिए राजी हो गए और इन्टरव्यू के दौरान उन्होंने सभी प्रश्नों के उत्तर दिए। हम लोग आशा करते हैं कि इनके जवाबों से कुछ भ्रांतियां दूर होंगी और समाज उनको समझ सकेगा-


सबसे पहले आप अपने परिवार के बारे में विस्तार से बताइए?
मैं हरियाणा के करनाल शहर की रहने वाली हूँ! वैसे तो किन्नरों के लिए असल परिवार वो शहर या गाँव होता है जहाँ पर हम लोगों का डेरा होता है या जहाँ हम लोगों ने माँग खाकर और लोगों को दुआएँ देकर गुजर-बसर करना होता है। लेकिन आपके सवाल के कारण हम आपको अपने परिवार के बारे में बता रहे हैं। मेरे परिवार में तीन भाई और एक छोटी बहन है, जो कि अब शादी शुदा है। मम्मी-पापा दोनों का इतंकाल हो चुका है।

आपका जन्म कब हुआ?
मेरा जन्म 16.12.1991

आपकी शिक्षा?
10वीं

आपको कब लगा कि आप किन्नर हैं?
आपका ये प्रश्न बहुत अच्छा लगा कि मुझे कब पता लगा कि मैं किन्नर हूँ, जब तक बचपन था तो मैं तब तक सामान्य बच्चों की तरह ही थी, मैं लड़की या लड़का सभी के साथ खेल सकती थी, लेकिन जैसे ही मैं बड़ी होती गई तो ना तो लड़के मेरे साथ खेलना पसंद करते थे और न ही लड़की। लड़कों में खड़ी होती तो लड़के मजाक उड़ाते और लड़कियों में खड़ी होती तो लड़कियां। तो थोड़ा अजीब लगता था और अकेलापन भी महसूस होता था और परिवार में भी मुझे न तो लड़कों वाले अधिकार थे और न ही लड़कियों वाले, मुझे मेकअप करना और तैयार होकर रहना पसंद था जबकि परिवार मुझे लड़का बनाने पर तुला हुआ था, तो मैं कई बार सोचती कि मेरी सोच तो लड़कियों वाली, हाव-भाव भी लड़कियों वाले हैं तो ये सब मुझे क्यों लड़कों की तरह रहने पर मजबूर करते हैं, जबकि मैं खुद को पूरी तरह लड़की समझती थी, मुझे लड़कों की तरह रहना बिलकुल पसंद नहीं था, जिसके कारण मेरी कई बार परिवार के सदस्यों द्वारा पिटाई भी की गई। जिसकी वजह से मैं बचपन से ही मानसिक तौर पर परेशान रहने लगी और मैं सोचती थी कि मुझ में कुछ तो अलग है दूसरे बच्चों से। कई बार बच्चे मेरा मजाक भी उड़ाते थे। तो बहुत कुछ हुआ छोटी-सी उम्र में ही जिसके कारण मुझे बहुत पहले ही एहसास हो गया था कि मैं दूसरे बच्चों से बहुत अलग हूँ।

क्या किन्नरों में एक ही समुदाय होता है? विस्तार से बताइए?
नहीं किन्नरो में भी अलग-अलग समुदाय होता है। जैसे कि जिसका हिन्दू के घर का जन्म है तो वो हिन्दू धर्म को मानता है, जिसका मुस्लिम के घर का जन्म है वो इस्लाम को मानता है और जिसका किसी सिख के घर का जन्म है तो वो सिक्ख धर्म को मानता है, और तो और किन्नरां में भी जात-पात को लेकर भेदभाव होता है और सच्चाई तो ये भी है कि तकरीबन 95 प्रतिशत किन्नर समाज का इस्लामीकरण हो चुका है, अगर कोई किन्नर इस्लाम धर्म नहीं अपनाता तो कुछ तथाकथित किन्नरों द्वारा उनको मानसिक तौर पर इतना परेशान किया जाता है कि उसको तंग आकर अपना धर्म परिवर्तन करना ही पड़ता है जो कि बहुत ही गलत है।

किन्नरों को मुस्लिम समाज अपनाने के लिए कौन लोग दबाव डाल रहे हैं।
अभी तक ये स्पष्ट नहीं हो पाया कि आखिर पूर्णतः हिन्दू धर्म का अंश कहे जाने वाले किन्नर समाज का लगातार इस्लामीकरण कैसे और क्यों हो रहा है, वैसा तो किन्नर समाज किसी भी जात-पात के चक्करों से बहुत ऊपर है और वो सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, लेकिन फिर भी ऐसी क्या सोच है जिसके कारण किसी हिंदू या सिख के घर में पैदा हुए किन्नर भी इस्लाम अपना रहे हैं या कोई उन पर दबाव बना रहा है। ये बात अभी तक स्पष्ट नहीं हो पा रही है। हालाँकि धर्म सभी अच्छे है और वो इन्सान को अच्छी राह दिखाते हैं।

क्या किन्नरों को कई भागों में बाँटकर देखा जा सकता है?
जी बिलकुल! किन्नर समाज भी कई भागों में बंटा हुआ है। जैसे कि आपको पता है कि कुछ किन्नर अपने डेरों में रहते हैं, वो सिर्फ बधाई वगैरह माँगने के लिए ही बाहर निकलते हैं उनको महंत जी, माई जी या नायक जी कहा जाता है। क्योंकि डेरों में रहने वाले किन्नरों को बहुत ही साफ-सुथरी छवि के धनी होते हैं और उनको ही असली फकीर का दर्जा प्राप्त है और कुछ किन्नर रेलगाड़ी, बस स्टैंड या लाल बत्ती पर भी माँगते देखे जा सकते हैं, लेकिन आजकल किन्नरों का भेष बनाकर कुछ लड़के या पुरुष भी माँगते नजर आ जाते हैं, जैसे रेलगाड़ी में, बस स्टैंड वगैरह कई जगह पर। लेकिन डेरों में नकली किन्नर के घुसने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसलिए डेरों में रहने वाले किन्नरों को बहुत ही पवित्रा माना जाता है। इसलिए हाँ हम किन्नरों को कई भागों में बाँट कर देख सकते हैं।

क्या किन्नरों को गोद लेने का अधिकार नहीं है। अगर नहीं है तो क्यों?
जी अभी पिछले 2-3 साल पहले ही माननीय सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को बच्चा गोद लेने का कानूनी अधिकार दिया है, लेकिन उसके बावजूद भी अनाथ आश्रमों या कुछ संस्थाओं द्वारा तरह-तरह के नियम बताकर किन्नरों को बच्चा गोद नहीं दिया जाता। जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है। आखिर एक किन्नर भी तो फकीर होने के बावजूद आत्मा या रूह से होती तो औरत ही होती है। आखिर वो भी माँ या मम्मी होने का सुख भोगना चाहते हैं । कुछ ऐसे ही मामलों के कारण कोई किन्नर अपने आप को दूसरों से अलग समझते हैं और मानसिक तौर पर परेशान रहने लग जाते है।

किसी ने कहा है कि केवल एक किन्नर ही किन्नर हो समझ सकता है। ऐसा क्यों?
नहीं ऐसा कुछ नहीं है, कोई भी अगर किन्नर से अपनेपन से पेश आए या उनको अपना समझकर उनके दिल को टटोले तो कोई भी किसी भी किन्नर की भावनाओं को समझ सकता है, लेकिन ये बेदर्द समाज उनकी भावनाओं को समझने का प्रयास ही नहीं करता और न ही समझना चाहता है। रही बात कि एक किन्नर ही दूसरे किन्नर को समझ सकता है तो ये बात बिलकुल सही है क्योंकि वो सब भी उस दौर से गुजर चुके होते हैं, जिस दौर से आज युवा किन्नर गुजर रहा होता है।

जब एक किन्नर समुदाय पर होने वाली दुर्दशा का अध्ययन करेगा तो वो सम्पूर्ण शोध यानी शोध होगा। इससे समुदाय के अन्दर और समाज में क्या बदलाव आएगा?
कहीं न कहीं मुझे ऐसा लगता है कि वाकई में किन्नर समाज पर एक शोध की जरूरत है ताकि उनकी असली दुर्दशा का पता चल सके कि उनको क्या -क्या कानूनी और मानसिक परेशानियाँ है, वैसे तो इस देश में किन्नरों के लिए कोई भी कानून बनाने से पहले उनकी स्थितियों को बारीकी से देखा तक नहीं जाता। रही बात बदलाव कि तो किसी व्यक्ति विशेष के करने से कुछ नहीं होगा, इसके लिए हमारे महिला-पुरुष के समाज और सरकार को मिलकर कुछ करना होगा, शायद तब किन्नर समाज के लिए बदलाव आ जाए, क्योंकि किन्नर तो इस समाज और देश में उस अनाथ बच्चे की तरह है जिसकी कोई माँ नहीं है वो कितना भी रोए या कुरलाए उसको कोई दूध पिलाने वाला नहीं, उसको तो खुद ही अपने लिए दूध माँगना होगा या रो-रो कर मर जाना होगा।

किसी किन्नर का कहना है कि एक किन्नर दूसरे किन्नर से अपनी बात कह सकता है जो महिलाओं और पुरुषों से अपनी बात नहीं बता सकते हैं। ऐसा क्यों?
8. ऐसा इसलिए क्योंकि हर किन्नर उस स्थिति से गुजर चुका होता है जिस स्थिति से आज कोई किन्नर गुजर रहा है, एक रोगी का दर्द तो दूसरा रोगी ही समझ सकता है। किसी महिला-पुरुष को अगर वो अपने दिल की बात बताए भी तो बताए कैसे? ये महिला-पुरुष प्रधान समाज किन्नरों को हेय या घृणा की दृष्टि से देखता है, उनको किन्नरों की उपस्थिति ही समाज में पसन्द नहीं तो वो क्या समझेगे। जबकि किन्नरों से बढ़कर हमारे समाज में कोई फकीर नहीं, क्योंकि किन्नर जन्म-जात का फकीर है।

भारत में हिजड़ों के कुल सात घराने हैं। इसके बारे में कुछ बताइए? ये घराना कैसे बनता है?
भारत में किन्नरों के कई घराने है ये बात बिलकुल सही है और भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी किन्नरों के वही घराने है जो कि हिन्दुस्तान में है, और ये घराने कोई नये नहीं है बल्कि ये बहुत पुरातन है, जैसे कि कुछ किन्नर पुरातन समय में राजदरबार में या रानियों के कक्ष में रहते थे और कुछ किन्नर सेना में या छावनियों में अपनी सेवा देते थे और कुछ मन्दिरों में अपनी सेवा प्रदान करते थे, तो जैसे कर्म वे पुरातन समय में करते थे तो उनके घरानों के नाम भी वैसे ही हो गए जैसे राजशाही, लश्कर यानी सेना वाले वगैरह-वगैरह। तो जब कोई किन्नर किसी भी घराने में चेला या गद्दीनशीन होता है तो वो उसी घराने की परंपरा या रिति-रिवाजों को आगे बढ़ाता है।

आम आदमी असली किन्नर और नकली किन्नर में अन्तर कैसे जान सकता है?
असली और नकली किन्नर की पहचान आप ऐसे कर सकते है कि जो असली किन्नर होते हैं वो सिर्फ अपने सीमित इलाकों में ही बधाई वगैरह माँगने का कार्य करते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाते है, आमतौर पर सबको पता होता है कि हमारे गाँव, शहर या इलाके में कौन-सी किन्नर बधाई लेने आती है, तो अगर उसके इलावा कोई और किन्नर आ जाए तो आप आपके इलाके वाले किन्नरों को सम्पर्क करो और इसके इलावा आप उनका वोट कार्ड या आधार कार्ड भी देख सकते है।

क्या किन्नरों में भी जातिगत विभाजन के अन्तर्गत किसको सर्वश्रेष्ठ माना जाता है?
नहीं किन्नरों में जातिगत तौर पर किसी को श्रेष्ठ नहीं माना जाता। हाँ, किन्नरों में भी जातिवाद है हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते। लेकिन किन्नरों में गद्दीनशीन किन्नर को ही श्रेष्ठ माना जाता है, उसको ही महंत जी या माई जी कहकर संबोधित किया जाता है।

क्या किन्नरों के बिना भारतीय संस्कृति अधूरी है। अगर है तो कैसे?
जी बिलकुल! किन्नरों के बिना भारतीय ही नहीं बल्कि हर संस्कृति अधूरी है, आप अगर किसी भी धर्म के धार्मिक ग्रंथों पर गौर फरमाए तो हर धर्म में किन्नरों को श्रेष्ठ दर्जा प्राप्त है, हर धर्म के अनुसार परमेश्वर, भगवान, अल्लाह या वाहेगुरु ने सिर्फ ढाई जात बनाई है, औरत-मर्द और किन्नर! औरत और मर्द इस सृष्टि को आगे बढ़ाएगे जबकि किन्नर उनके लिए मालिक से दुआ करेगा तो इसलिए किन्नरों को ही सबसे बड़ा फकीर माना गया है।

आज किन्नर क्या हैं एक जाति सूचक शब्द है या कुछ और?
नहीं किन्नर शब्द को हम जातिसूचक शब्द नहीं कह सकते है, लेकिन आमतौर किन्नरों के लिए प्रयोग किया जाने वाला ‘हिजड़ा’ शब्द बहुत ही अपमानित और घृणित शब्द लगता है, हाँ, हम इस शब्द को जातिसूचक शब्द कह सकते है और भारत सरकार द्वारा इस शब्द पर तुरंत प्रभाव से रोक लगनी चाहिए। इसके अलावा किन्नरों को कई नामों से पुकारा जाता है जो कि बहुत ही सम्मानजनक शब्द हैं और सुनने में भी अच्छे लगते है जैसे कि माई जी, गुरु जी, महंत जी, बाबा जी, हाजी जी ( जिन्होंने हज-मदीना किया हो ), बाई जी वगैरह-वगैरह।

किन्नर समाज आज भी शिक्षा व राजनीति अधिकारों से वंचित क्यों है? क्या आप लोगों ने इसकी आवाज उठाई?
अगर किन्नर समाज राजनीति या शिक्षा में पिछड़ा हुआ है तो ये सब हमारी ही मेहरबानी है क्योंकि हमारी भारत सरकार आज तक किन्नरों की शिक्षा के कोई अभियान चलाया ही नहीं और न ही कभी प्रयास किया, अल्पमत में होने के बावजूद भी इनके संरक्षण के लिए न तो कोई कदम उठाया गया और न ही कोई कानून बनाया गया, हमारे भारत देश में जानवरों का संरक्षण हो सकता है लेकिन अल्पमत में मौजूद इंसानो का नहीं! लेकिन फिर भी कई किन्नर अपने प्रयासों के दम पर ही एमएलए या मंत्रा बने बैठे है, लेकिन सिर्फ अपने दम पर, भारत सरकार की मेहरबानी से नहीं, यहाँ महिलाओं को आरक्षण मिल सकता है, जातिगत तौर पर आरक्षण मिल सकता है, लेकिन बहुत कम संख्या में होने के बावजूद किन्नरों को नहीं, न तो हमारे महिला-पुरुष प्रधान समाज और न ही सरकार ने न कभी किन्नरों के उद्धार के बारे में सोचा है और शायद न ही सोच सकते है, जहाँ तक हो सकता है किन्नर समाज अपने समाज के लिए खुद प्रयास करता ही रहता है ।

आपके समाज के उत्थान के लिए मुख्य रूप से कौन-कौन सी संस्थाएं प्रयत्न कर रही हैं?
किन्नर समाज के उत्थान के लिए मुख्य रूप से ‘अस्तित्व ट्रस्ट, किन्नर माँ ट्रस्ट, सक्षम ट्रस्ट’ इसके अलावा भी बहुत-सी संस्थाएँ है जो अपने-अपने स्तर पर काम कर रहीं है और प्रयासरत भी है।

उनके प्रयत्न से आपका वर्ग कितना संतुष्ट है?
मुझे ऐसा लगता है किसी भी देश में कानून ही सर्वोपरि होता है और हमारे भारत देश में हमारे लिए हमारा संविधान ही श्रेष्ठ है और अगर हमारे देश में कहीं कानून में किन्नरों के हितों को नजरअंदाज किया गया है तो वो हमारी भारत सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वो कुछ ऐसे नये कानून बनाये जिनसे की किन्नर समाज का उत्थान हो और वो भी सम्मान की ज़िंदगी जी पाये और अपने हकों के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाये। रही बात कि जो संस्थाएँ किन्नरों के उद्धार के लिए प्रयास कर रही हैं वो अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश करती हैं किन्नर समाज के उत्थान के लिए। लेकिन फिर भी कहीं न कहीं जब तक हमारी सरकार या कानून मिलकर प्रयास नहीं करता, तब तक मुझे नहीं लगता कि बात बन पायेगी।

आपने अपना घर खुद छोड़ा या घर वालो ने निकाल दिया?
न ही मैंने खुद घर छोड़ा और न ही घरवालों ने निकाला। हालात कुछ ऐसे पैदा हो चुके थे कि मुझे घर छोड़कर चले जाना पड़ा, जैसी मैं थी मेरे घरवालों के लिए मुझे उस रूप में अपना पाना बहुत ही मुश्किल था, मुझे बात-बात पर टोकना और मुझ में कमीयां निकालना उनकी रोज की आदत हो चुकी थी, वो कभी ये समझ ही नहीं पाये कि मैं ऐसी हूँ तो ये भगवान की मर्जी है, उन्होंने मुझ में वो हाव-भाव या जैसी भी मैं थी, उन्होंने मुझे जन्म से ऐसा ही बनाया है और फिर ऊपर से गली मोहल्ले वालों द्वारा मेरा बार- बार मजाक उड़ाना, मैं इन सब से बहुत तंग आ चुकी थी, न कोई घर, न कोई बाहर, कोई ऐसा नहीं था जिसको मैं अपना दर्द सुना सकूँ, बहुत कोशिश की मैंने अपने आप को बदलने की लेकिन चाहकर भी मैं अपने आपको नहीं बदल पायी, मेरे घरवाले भी मुझे समझा समझा कर थक चुके थे, लेकिन मैं करती तो क्या करती, इस शरीर के साथ तो फेर बदल किये जा सकते है, लेकिन मैं अपनी आत्मा को कैसे बदलती, मेरे अन्दर की आत्मा पूरी तरह लड़की वाली थी और मैं चाहकर भी उसको लड़का नहीं बना पायी, न कोई मित्रा, कोई दोस्त, न कोई मुझे घर में समझने वाला और न कोई बाहर, मैं इस अकेलेपन से बहुत तंग चुकी थी, मैं अकेली बैठकर रोती और सोचती कि आखिर भगवान ने मुझे ही ऐसा क्यों बनाया है, कभी भी कोई भी नहीं समझ पाया मुझे, मैं सोचती काश मैं भी मेरे दूसरे दोस्तों की तरह सामान्य होती, बहुत सी बातें हुई जिनसे तंग आकर मैंने अपना घर छोड़ दिया और चली आई उस दुनिया में जहाँ कोई मेरा मजाक उड़ाने वाला नहीं था और न ही कोई मुझे ये कहने वाला था कि तुम ऐसे क्यों हो, न ही वहाँ कोई मुझे लड़का बन कर रहो, ऐसा कहने वाला भी कोई नहीं था, यहाँ सब मुझ जैसे ही थे, शायद ये दुनिया मेरे लिए ही बनी थी, फिर जब मेरे घरवालों को इस बात का पता चला तो उन्होंने कानूनी तौर पर एक गौद नामे का कागज बनाकर मुझे उन लोगों को ही सौंप दिया जिनके लिए शायद भगवान ने मुझे बनाया था, मैंने जिन्दगी में सिर्फ दर्द सहना सिखा है, जब से होश सम्भाला है और अब तो इसकी आदत हो चुकी है।

क्या आपको पढ़ने-लिखने की रुचि थी?
बिलकुल थी, मुझे पढ़ने में रुचि थी, आखिर मेरे भी कुछ सपने थे, मेरे भी कुछ अरमान थे, मैं भी पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मन्जूर था, लेकिन आज मैं जैसी भी हूँ, खुश हूँ, लोगों की खुशियों में ही मेरी खुशी है, और मैं भगवान से सबके लिए दुआ करती हूँ कि भगवान सबको खुश रखे।

जब से आपने अपना घर छोड़ा है तब से क्या किसी परिवार वालों से मुलाकात हुई?
जी बहुत बार हुई, कई बार मिली हूँ उस सब के बाद। और बहुत ही प्यार और इज्जत से पेश आते हैं अब वो मेरे साथ कद्र करते हैं अब ये सोचकर कि ये तो फकीर इन्सान हैं।

आपके रिश्तेदारों का व्यवहार आपके साथ कैसा रहा है?
पहले तकरीबन सभी का एक जैसा ही था, लेकिन अब मैं किसी भी रिश्तेदारों के घर नहीं जाती हूँ तो कुछ नहीं कह सकती किसी के बारे में ।

आपके डेरा में कुल कितने सदस्य है और उनको काम क्या रहता है?
मेरे डेरे में सिर्फ मैं ही रहती हूँ, वैसे ढोलक वगैरह वाले आते हैं, मेरे साथ बधाई वगैरह पर जाने के लिए, लेकिन वो शाम को ही अपने-अपने घर चले जाते हैं, वैसे डेरे में तकरीबन कोई न कोई गाँव या मौहल्ले पड़ोस वाले आते-जाते रहते है।

आपके समाज में गुरुओं का क्या महत्त्व होता है?
मुझे ऐसा लगता है कि हमारे ही नहीं बल्कि किसी भी सभ्य और संस्कारी समाज में गुरु का एक विशेष महत्त्व होता है, हमारी भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान का रूप बताया गया है और कहा जाता है कि गुरु ही वो रास्ता है जो कि देर-सवेर हमें उस ईश्वर के द्वार तक ले के जाता है! गुरु की श्रेष्ठता संत कबीर साहेब जी के इस दोहे से साफ झलकती है ‘‘गुरु र्गोवंद दोउ खड़े काके लागू पाएँ, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताएं“ कुछ ऐसा ही दर्जा हम अपने गुरु को देते हैं, हमारे लिए गुरु बहुत महत्त्व रखते है।

आपके गुरु का क्या नाम है? क्या गुरु का आदेश सर्वोपरि होता है?
मेरे आदरणीय और सम्मान योग्य गुरु जी का नाम ‘श्री मनजीत महंत जी’ है और रही बात कि गुरु के आदेश के सर्वोपरि होने कि तो बिल्कुल गुरु जी का आदेश ही हमारे लिए सर्वोपरि होता है, लेकिन वो हालात और उस आदेश पर निर्भर करता है जो कि गुरु जी का दिया हुआ है। कुछ आदेश ऐसे भी हो सकते हैं जिनसे कि शायद हम सहमत न भी हों, एक गुरु-चेला संस्कारी सभ्यता से अलग हर इन्सान की अपनी सोच और विचार भी होते हैं और हर इन्सान को अपनी सोच और विचार किसी के भी सामने रखने का पूरा-पूरा अधिकार है।

गुरु-चेला की परंपरा के बारे में बताइये?
मुझे लगता है कि अगर आप भारतवासी हैं तो आपको गुरु चेला प्रथा के बारे में कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं। क्योंकि भारतीय संस्कृति और इतिहास में गुरु-शिष्य परंपरा के कई उदाहरण मौजूद है। लेकिन हमारे लिए हमारे गुरु और उनका आदेश सर्वाधिक सर्वोपरि होता है। हम अपने गुरु को ही माता-पिता एवं भगवान का दर्जा देते हैं। इसलिए हमारे द्वारा किये जाने वाला शृंगार हमारे गुरु को समर्पित होता है, मंगलसूत्रा पहनना, माँग भरना, चूड़ियां डालना सब हम हमारे गुरु की लम्बी उम्र की कामना के लिए करते हैं।

क्या आपने अपने गुरु से दीक्षा ली है। अगर ली है तो यह दीक्षा किस तरह की होती है?
जी बिल्कुल हमने अपने गुरु जी से दीक्षा ली है और इसमें होता ये है कि जब कोई किन्नर किसी गद्दीनशीन किन्नरों के डेरों में चेला होता है तो उसको 7-8 दिन तक नई नवेली दुल्हन की तरह हल्दी लगाई जाती है, और तैयार करके उसको दीक्षा दी जाती है और माता-पिता द्वारा रखे हुए नाम को बदलकर एक नया नाम दिया जाता है, और खूब खुशियाँ मनाई जाती है और सब किन्नर उसको अपनी-अपनी तरफ से शगुन देते है, फिर उसके बाद उसको बताया जाता है कि तुम किस इलाके में बधाई वगैरह माँग सकते हो और फिर उसको उस इलाके का गद्दीनशीन महंत बना दिया जाता है।

क्या किन्नर लोग गुरु को पति परमेश्वर के रूप में मानती है?
जी! किन्नर अपने गुरु को पति कैसे मान सकती हैं, गुरु तो गुरु होता है। लेकिन हाँ, मायने कुछ ऐसे ही है। क्योंकि किन्नर सजना-संवरना और हार-शृंगार, चूड़ा डालना, माँग भरना। ये सब तभी तक करती है जब तक गुरु जीवित हो। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वो अपने गुरु को पति मानती है।

आप जिस गाँव में रह रहे हैं वहाँ के लोगों का व्यवहार आप के प्रति कैसा है। शुरू से लेकर अब तक?
जिस गांव में मैं रह रही हूँ वो हरियाणा राज्य के जिला कैथल का भून्ना गाँव है और पंजाब के बिलकुल नजदीक है और इस गाँव के लोग तकरीबन बहुत अच्छे है और सब मेरे साथ बहुत प्यार और इज्जत से पेश आते हैं, बाकि आपको पता ही है कि दुनिया सभी तरह की होती है सबकी अपनी अपनी सोच और नजरिया होता है, लेकिन हम तो साधु संत और फकीर इन्सान है हमें किसी से क्या! कोई कैसा भी व्यवहार करे लेकिन हमें तो सबको दुआ देनी है और सबका भला माँगना है और जहाँ मैं रहती हूँ तो मैं उस गाँव के अच्छे और बुरे सभी इन्सानों को दुआ देना और भगवान से उनके लिए खुशी माँगना ही मेरा कर्म है।

किन्नरों की खराब स्थिति के लिए किसको जिम्मेदार माना जा सकता है और उसका कोई हल है?
किन्नरों की खराब स्थिति के लिए सबसे पहले तो हमारा महिला-पुरुष प्रधान समाज है क्योंकि ये लोग कभी किन्नरों के साथ मित्रातापूर्ण व्यवहार करते ही नहीं, मुझे तो ऐसा लगता कहीं न कहीं ये किन्नरों को इन्सान ही नहीं समझते, इनको उनके चेहरे की मुस्कान तो नजर आती है, लेकिन आँखों के सूख चुके आँसुआें का दर्द नहीं, ये लोग कुछ पैसे बधाई के रूप में देकर ये सोच लेते है की चलो शायद इन पैसों से ही इनका कल्याण हो जाएगा, लेकिन इन लोगों को ये कौन समझाए कि सबकुछ पैसा ही नहीं होता, आप बधाई के अलावा उन्हें अपनापन और प्यार भी दो, जिसके लिए वो बचपन से तरस रहे है और कुछ लोग तो उनको बधाई देते हुए भी चिढ़ते हैं, अब इनको ये कौन समझाए कि आपके बच्चों के हर समय दुआ माँगने वाला ये फकीर इन्सान जाए तो जाए कहाँ? आप जो बधाई देते हो उसके कारण ही बेचारे भरपेट रोटी खा पाते है। दूसरा हमारी भारत सरकार ने किन्नरों को हमेशा से ही नजरअंदाज किया है और किसी भी कल्याणकारी सरकारी योजनाओं में किन्नरों के हित का न तो जिक्र किया जाता और ही ध्यान दिया जाता। किसी किन्नर से गरीब कौन होगा जो दूसरे के आसरे पर निर्भर है, बधाई मिल गई तो रोटी खा ली, नहीं तो भूखे मरने जैसे हालात पैदा हो जाते हैं, बावजूद इसके किसी भी किन्नर का पीला या गुलाबी राशन कार्ड तक नहीं बनाया जाता! सरकार सभी को मकान बनाने के लिए जगह और पैसे उपलब्ध करवाती है लेकिन सिर्फ किन्नरों को नहीं! आखिर क्यों ? भारत देश में पैदा हुए, भारत सरकार को ही वोट देते है फिर भी इन बेसहारा लोगों के साथ सौतेला वाला व्यवहार क्यूँ? क्या किन्नर कोई बिजनेस करते हैं ? क्या वो खेती-बाड़ी करते हैं? आप सब कुछ जानकर भी इन लोगों के लिए कोई काम नहीं करते। बस अब हम इससे ज्यादा क्या कहें और किसको दोष दें? बाकि आप सब खुद समझदार हो।

आम लोगों की अवधारणा है कि किन्नर का जनाजा या अन्तिम संस्कार के लिए ले जाते हैं तो उसको मारते हुए ले जाते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है?
हा हा हा हा, नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है, ये धारणा आम लोगों द्वारा बनाई हुई है, ये सिर्फ एक अफवाह मात्रा है, किसी किन्नर की मृत्यु या इंतकाल होने पर उसको उसके परिवार और रिश्तेदारों की मौजूदगी में दफनाया जाता है या अंतिम संस्कार किया जाता है, किसी किन्नर की मृत्यु होने पर उसके परिवारजनों जैसे कि माँ-बाप, भाई-बहन सबको बुलाया जाता है, भला कोई परिवार वाला अपने किसी अपने के साथ ऐसा करने देगा क्या? जहाँ किसी किन्नर का डेरा होता है, वहाँ भी उसके चाहने वाले या शुभचिंतक होते है, भला कोई अपने किसी चाहने वाले के साथ ऐसा करने देगा क्या? ये आम लोगों द्वारा बनाई हुई एक अफवाह मात्रा है, सिर्फ एक धारणा है। किन्नर एक साधू-संत और फकीर होता है तो इसलिए उसको भी दूसरे साधू संतां की तरह ही बहुत ही सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाती है, जो किन्नरों के डेरों से दूर रहते है ये सिर्फ उनकी सोच और सुनी-सुनाई बात है, बाकि जो किन्नरों के डेरों के आस-पास रहते है वो तो कई बार किन्नरों कि अंतिम विदाई में शामिल हो चुके होते है तो उनके मन में ऐसी कोई धारणा नहीं होती है क्योंकि वो सबकुछ अपनी आँखों से देख चुके होते है। इसलिए ऐसा कुछ नहीं है।

किन्नरों में अन्तिम संस्कार क्या रात में ही होता है?
नहीं-नहीं हम कोई क्रिमिनल या चोर डाकू थोड़े ही हैं, हमें भला किसका डर है! हम क्यों रात के अंधेरे में किसी का संस्कार करेंगे। किसी भी किन्नर का संस्कार दिन के उजाले में और उसके परिवारजनों और शुभचिंतको की मौजूदगी में होता है।

किसी किन्नर की मौत होने के बाद पूरा किन्नर समुदाय एक हफ्ते तक भूखा रहता है। ये बात कहाँ तक सही है।
हा हा हा हा पता नहीं लोगों ने कैसी-कैसी बातें बना रखी हैं। बाकि का तो पता नहीं लेकिन मैं एक दिन से ज्यादा भूखी नहीं रह सकती। जहाँ तक मुझे इतने साल हो गये तो मैंने कभी किसी किन्नर को किसी दूसरे किन्नर की मौत पर दो दिन भी भूखा रहते नहीं देखा। सब बकवास है ये बातें।

बहुचरा माता के बारे में कुछ बताइये?
माता बहुचरा हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक है और देवी-देवता या किसी भी पैगम्बर की इन्सान के पास प्रमुख जानकारी नहीं होती, वो सिर्फ उनके के बारे में उतना ही बता सकते हैं जितना उन्होंने पढ़ा या सुना होता है। माता बहुचरा जी तकरीबन सारे भारत में पूजी जाती है और इन्हें खासतौर पर किन्नर समाज से जोड़कर देखा जाता है, क्योंकि ये किन्नर समाज की इष्टदेवी मानी जाती है और किन्नर चाहे किसी भी जाति या धर्म से ही क्यों न हो, वो माँ बहुचरा जी की पूजा उपासना करता ही है, माँ बहुचरा जी का प्रमुख मन्दिर गुजरात के संथोल में है और ये गुजरात की प्रमुख कुलदेवियों में से एक है, कहते है कि किसी राजा के घर एक संतान थी, वो बचपन में तो सामान्य बच्चों की तरह ही थी और देखने में बिल्कुल लड़की की तरह ही लगती थी, लेकिन जैसे जैसे वो जवान होती गई तो उसकी आवाज लड़कों की तरह भारी होती गई और उसके चेहरे पर किसी भी सामान्य लड़कों की तरह ही बाल उगने शुरू हो गए। वो शक्लो-सूरत, चाल-ढाल और कुदरती तौर पर शारीरिक रूप से तो लड़की प्रतीत होती थी, लेकिन चेहरे पर उग चुके अनचाहे बालों और आवाज से लड़का लगती थी, राजा उसको राजमहल से बहुत ही कम बाहर निकलते देते थे, उस पर तरह-तरह की पाबंदियां थी, क्योंकि उसको देखकर राज्य के लोग तरह तरह की बातें करते थे। राजा के कई बड़े-बड़े वैद्य -हकीमों को बुलाया और अंततः पता लगा कि राजा कि इकलौती संतान न तो लड़का थी और न ही लड़की। इस बात को जानकर राजा और रानी बहुत उदास हुए और अपनी फूटी किस्मत को कोसने लगने, ये सब देखकर राजा की उस इकलौती संतान को बहुत दुःख हुआ और मन ही मन रोज भगवान को और अपनी फूटी किस्मत को कोसती, एक दिन अचानक से उसके सपने में एक देवी आई और कहने लगी कि उदास मत हो और जाओ फलाँ जगह पर किन्नरों का डेरा है और वहाँ एक तालाब है। अगर तुम उस में स्नान करोगे तो तुम्हें जो दुख है वो मिट जायेगा, कहते है राजा की उस पुत्रा या पुत्रा ने वहाँ जाने का फैसला किया और पहुँच गया वो उसी जगह पर जो उसे सपने में उस देवी ने बताई थी और वो क्या देखता है कि वहाँ किन्नर नाच-गा रहे है और किसी देवी की उपासना कर रहे है, तभी उसके सामने से एक कुत्तिया भागती हुई गई और तालाब में घुस गई और जब वो बाहर निकली तो मानो उसका दूसरा जन्म हुआ हो, क्योंकि वो अब कुत्तियां नहीं बल्कि एक कुत्ता थी, उसको बहुत हैरानी हुई और अंततः उसने भी तालाब में स्नान किया और जब वो स्नान करके तालाब से बाहर निकला तो वो माँ बहुचरा की कृपा से किन्नर योनि से मुक्त हो, पूर्णतः एक राजकुमार बन चुका था ।

किन्नरों के रीति-रिवाज के बारे में कुछ बताइये?
किन्नरों में भी अलग अलग रिति-रिवाज है, जैसे हरियाणा के अलग, पंजाब के अलग। ऐसे हर राज्य के किन्नरों के अपने अपने रिति-रिवाज है और अपना-अपना इतिहास और अपनी-अपनी सभ्यता है।

किन्नर कभी अपनी हार नहीं मानता है। क्या ये कथन सही है? ये स्वभाव से जिद्दी होते हैं?
मुझे ऐसा लगता है कि जब तक मंजिल न मिल जाए तब तक हार किसी को नहीं माननी चाहिए, हाँ ये सच है कि किन्नर इतनी जल्दी हार नहीं मानते हैं और स्वभाव की भी थोड़ी जिद्दी होती है। लेकिन अगर प्यार से पेश आए तो वो हार जाती है हर किसी से! क्योंकि वो प्यार की भूखी होती है, अगर आप कोई बात उनको सहज स्वभाव से समझाएगे तो वो समझ जाएँगी, लेकिन अगर आपने अकड़ दिखाई तो बस फिर आपकी खैर नहीं।

एक किन्नर की ख्वाहिश क्या होती है?
इस बारे में हम कुछ नहीं कह सकते, किन्नर किसी एक शख्स का नाम नहीं, जिसके बारे में हम सबकुछ बता सकते हैं। एक समुदाय है, एक वर्ग है और इसमें लाखों लोग हैं। सबकी अपनी अपनी सोच और ख्वाहिश हो सकती हैं।

आपको आम लोगों को देखकर कैसा लगता है?
शायद आपको लगता है कि हम किसी दूसरी दुनिया के लोग हैं या एलियन हैं। आम लोगों को तो हम हर रोज देखते है और न जाने कितनों को देखते हैं, लेकिन किसी के बारे में हम तब सोचते हैं जैसा कि उसका व्यवहार होगा हमारे साथ।

किन्नर भी समाज में ही पैदा होता है फिर क्यों समाज किन्नरों के साथ सौतेला व्यवहार करता है?
किन्नर भी इसी समाज में पैदा होती है और उनके साथ सौतेला वाला व्यवहार क्यूँ होता है? मुझे लगता है ये आपको और आपके उन लोगों को सोचना चाहिए। जो आपके प्रश्न और मेरे उत्तर पढ़ रहे होंगे कि ऐसा हम और हमारी भारत सरकार उन लोगों के साथ ऐसा क्यों कर रही है।

क्या आपने गिरिया के बारे में सुना है?
जी माफ करना हमें इस शब्द का मतलब नहीं पता। ये सड़क छाप लोगों की भाषा का शब्द है और वो ही इस्तेमाल करते होंगे। हम या तो हिंदी भाषा जानते हैं या पंजाबी या फिर हरियाणवी। क्योंकि हम एक सभ्य और संस्कारी समाज में रहते है।

किसी किन्नर ने कहा है कि नेग लेना मेरा अधिकार है। ये किस तरह का अधिकार है?
बिल्कुल नेग लेना उस किन्नर का मौलिक अधिकार है, जिस किन्नर के इलाके में आप रहते है। आप मुझे ये बताइये आपके दिये हुए नेग के अलावा किन्नरों के पास और कौन-सा साधन आय का और कौन-सा जरिया है अपना और अपने समाज के लोगों का पेट भरने का। क्या उनके पास खेती-बाड़ी है? क्या कोई बिजनेस या कारोबार है? क्या कोई नौकरी है? क्या है? उनके पास! आपके दिये हुए नेग से ही वो दो वक्त की रोटी खाते है और बधाई कौन-सी हर रोज होती है, कब बच्चा पैदा होता है और कब 20-25 साल में उसकी शादी होती है, तब कहीं जाकर उनको बधाई नसीब होती है। जिन्दगी में जो प्रमुख बधाई हम देते है वो जन्म और शादी की ही तो है। कौन-सा नेग के रूप में वो आपसे सारी उम्र की रोटी माँगते हैं। एक इन्सान आपके बच्चों के जन्म से लेकर उनके जवान होकर शादी होने तक दुआ करता है कि शायद जब ये बच्चा जवान होगा तो इसकी शादी होगी और हमें बधाई मिलेगी और फिर इसका बच्चा होगा और फिर हमें बधाई मिलेगी। वो सारी उम्र आपके बच्चों के लिए दुआ माँगता-माँगता मर जाता है और आपको उस फकीर को दी हुई कुछ या नेग भी दुःख देता है। वो अपने लिए कभी भगवान से कुछ नहीं माँगता, बस यही दुआ करता रहता है कि हे भगवान उसके घर में बच्चा नहीं उसको बच्चा देना, हे भगवान उसके लड़के की शादी हो जाए, हे भगवान उसका लड़का नौकरी में लग जाए तो हमें कुछ बधाई मिले। सारी उम्र आपके लिए दुआ माँग-माँग कर कहीं उसको बधाई नसीब होती है तो वो कैसे कह दे कि ये मेरा अधिकार नहीं। हाँ, ये हमारा अधिकार है। जिनके घर में भगवान सारी उम्र खुशियाँ नहीं देता वो उनसे क्यूँ नहीं माँगते बधाई? तो भैया आप खुद विचार करो कि उसने आपसे माँगा ही क्या है। उन लोगों का भी तो दिल देखो जो अपने माँ-बाप, भाई-बहन सबको छोड़कर एक नई दुनिया बसा लेते है सिर्फ आपके और आपके बच्चों की दुआ-खैर के लिए। सबकुछ छोड़कर चले आते हैं ये सोचकर कि नहीं भगवान ने हमें सबकी खुशियाँ माँगने के लिए बनाया है। आप क्या सोचते हो, उनको उनके घर में दो रोटी नहीं मिल सकती थी। लेकिन वो कितने भी धनवान घर के ही क्यों न हों, वो फिर भी आपके दरवाजे पर माँगने आते हैं। पता है क्यूँ ? क्योंकि वो फकीर है और उसे वो धर्म निभाना है जिसके लिए उसको अल्लाह, वाहेगुरु, भगवान, परमेश्वर ने बनाया है। तो वो कैसे कह दे कि बधाई माँगना मेरा अधिकार नहीं? जवाब दीजिये?

आपको नहीं लगता है कि कुछ किन्नरों ने नंग को अपना धंधा बना लिया है।
जी बिल्कुल मैं ये बात मानती हूँ कि जब कोई किन्नर किसी के घर में बधाई लेने जाती है तो कई बार छोटी-मोटी नोक-झोंक हो जाती है। कई बधाई देने वाले की तरफ से तो कई बार किन्नरों की तरफ से। कई बार किन्नर भी जिद्द कर लेते है अधिक नेग की जो कि गलत है।

मान्यताओं के मुताबिक किन्नर को ये वरदान मिला है कि उनकी हर दुआ/ बद्दुआ जल्दी पूरी होती है। आपको क्या लगता है।
जिस प्रकार हवा को कैमरे में कैद नहीं कर सकते, उसको देख नहीं सकते। ठीक उसी प्रकार दुआ और बद्दुआ को स्पष्ट नहीं किया जा सकता सिर्फ उसके अच्छे और बुरे परिणाम को महसूस किया जाता है। दुआ और बद्दुआ वो लफ्ज हैं जिनको अल्लाह, वाहेगुरु भगवान, परमेश्वर ने अपने चाहने वालों के लिए बनाया है बशर्ते उस अल्लाह, वाहेगुरु, भगवान, परमेश्वर को अपने आप को समर्पित करना पड़ता है, दुआ और बद्दुआ का असर करना इस बात पर निर्भर करता है कि दुआ माँगने वाला हो या बद्दुआ देने वाला, वो जो कुछ भी मालिक से माँगे पर माँगे दूसरों के लिए। ये बात किन्नर समाज पर पूर्ण रूप से लागू होती है, क्योंकि वो अपने लिए उस मालिक से बहुत कम ही कुछ माँगते हैं और पूरा जीवन सिर्फ दूसरों के लिए माँगते-माँगते बिता देते है। दुआ और बद्दुआ का असर इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस भावना से किसी किन्नर से दुआ मंगवा रहे है अपने लिए या किसी और के भी लिए बद्दुआ का असर इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उसकी रुह या आत्मा को कितना दर्द पहुँचाया है या उसको किस हद तक अपमानित किया कि वो आपको बद्दुआ देने पर मजबूर हो गया। बिल्कुल सत्य है ये बात कि किन्नरों कि दुआ और बद्दुआ बहुत जल्दी ही असर करती हैं। क्योंकि किन्नर ही एकमात्रा वो शख्सियत है जिसको मालिक, अल्लाह, वाहेगुरु, भगवान, परमेश्वर ने जन्म से फकीर बनाया है अपनी मर्जी से। उस मालिक ने उन्हें खुद चुना है अपने बनाए हुए लोगों के लिए दुआ और बद्दुआ माँगने के लिए। किन्नर कभी किसी को बद्दुआ नहीं देते जब तक कि सामने वाला हद से ज्यादा उनको दुखी न कर दे या जब कोई ऐसी बात न कह दे जिससे कि उनका दिल दुखे।

कुछ लोगों का मानना है कि पुलिस से तगड़ा है नेटवर्क आप लोगों का। कहीं भी बच्चा पैदा होता है, तो आप लोगों को फौरन पता चल जाता है। ये कौन लोग हैं जो बताते हैं या कोई एजेंसी काम करती है?
नहीं-नहीं। न ही कोई एजेंसी काम करती है और न ही कोई नेटवर्क है बल्कि सच तो ये कि हमें पता होता कि इस घर से हमने शादी कि बधाई ली है तो हम तब से ही इस आस में रहते है कि भगवान इनको कोई तो खुशी देगा जैसे कि लड़का या लड़की का पैदा होना। तो हम किसी न किसी से पूछ ही लेते है कि भैया हमने उस घर से शादी की बधाई ली थी, क्या उनके घर में मालिक ने कोई और भी खुशी दी क्या! मतलब लड़का-लड़की क्या हुआ उनके घर में, और शादी के बारे में हमें ये पता होता कि हम उस इलाके में हर रोज बधाई लेने जाते हैं तो किनके घर में शादी होने वाली है। इस से ज्यादा कुछ नहीं। अब अगर हम खबर नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा, हमें रोटी ही दूसरों की खुशियों के सहारे मिलती हैं! जैसे एक किसान को पता होता है कि मेरी फसल कब पकेगी उसी प्रकार किन्नर को भी पता होता कि किस घर में खुशी आने वाली है और भला पता भी क्यों न हो। हमारी तो खेती-बाड़ी भी यही है।

अभी तक मैंने जो पढ़ा और सुना है कि किन्नरों के चार वर्गों में बांटा गया है- बुचरा, नीलिमा, मनसा और हंसा। इन चारों में बुचरा ही वास्तविक किन्नर होते हैं। क्या आपको इसकी कोई जानकारी है।
जी बिल्कुल बहुचरा किन्नर उन किन्नरों को कहा जाता है जो डेरों में रहते है या गद्दीनशीन होते हैं और बहुचरा किन्नर ही वास्तविक किन्नर होते है ये बात बिल्कुल सत्य है और मुझे लगता है बाकि और के बारे में कोई चर्चा करने का मुझे कोई अधिकार नहीं।

कुछ लोगों का आरोप है कि जब किसी परिवार में किन्नर बच्चा पैदा होता है तो आप लोग उसको जबरदस्ती लेने के लिए घर पहुँच जाते हैं और उसे लेकर ही आते हैं। क्या ये बात सही है?
नहीं-नहीं ऐसा कुछ नहीं है। अगर हम किसी बच्चे किन्नर को उसके घर से लाते है तो उसमें उसके परिवार की रजामंदी होती है और बाकायदा हम कानूनी तरीके से ही उसको उसके घर से लाते है।

किसी उपन्यास का नायक (किन्नर) कहता है कि हमें आरक्षण की जरूरत नहीं है। मुझे लगता है कि इसके लिए माँ-बाप को ही कटघरे में लाने की जरूरत है। इस कथन से आप कहाँ तक सहमत है।
जिनका ये बयान है। हो सकता है कि उनकी अपनी सोच और अपने कुछ विचार हो और मुझे ऐसा लगता है कि अपनी और विचार प्रकट करना, हर इंसान का अपना मौलिक अधिकार है। लेकिन आप मात्रा एक इन्सान की सोच को सर्वोच्च मानकर 50 लाख लोगों की सोच को नजरअंदाज नहीं कर सकते और जहाँ तक मुझे पता है ये बयान शायद किसी ऐसे किन्नर का हो सकता है जो धन्य-धान्य और दौलत-शोहरत से परिपूर्ण होगा। लेकिन सभी किन्नरों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं है। अब जो किन्नर अपने -अपने इलाके में बधाई वगैरह माँग रहे है(हालांकि मैं खुद भी इलाका माँगती हूँ ) या जो किन्नर राजनीति या फिल्म जगत में हो या जो किन्नर अपनी कुछ संस्थाएं चला रहे है तो जाहिर-सी बात है, उन्हें क्या जरूरत है आरक्षण की! आरक्षण की जरूरत तो उन्हें है जो किसी किन्नर समाज की प्रताड़ना से तंग आकर कोई और काम करना चाहते हों जैसे सरकारी नौकरी वगैरह। क्योंकि प्राइवेट वाले तो इनको कभी भी हटा सकते हैं, फिर कहाँ जाएँगी बेचारी। या जो एक सम्मान कि जिन्दगी जीना चाहते हैं और योग्यता होने के बाद भी सिर्फ इसलिए कोई नौकरी वगैरह नहीं कर सकते क्योंकि वो किन्नर हैं और उन्हें किसी भी तरह की कोई छूट नहीं है।

क्या आपको नहीं लगता है कि जिनके माँ-बाप अपने किन्नर बच्चे को घर से निकाल देते हैं या उसके साथ बुरा सलूक करते हैं। उनको दण्डित करना चाहिए? आपकी क्या राय है?
डॉ. साहब कोई भी अपने बच्चे को घर से निकालना नहीं चाहता, लेकिन ये समाज उनको अपनाता ही नहीं तो शायद ये समाज की एक घृणित सोच का परिणाम है कि माँ-बाप को खुद ही अपने बच्चे को अपने से दूर करना पड़ता है और जहाँ तक मुझे लगता है कि वो आपकी दुनिया से उस दुनिया में ज्यादा सुकून से रह सकता है जो कि सिर्फ उसके जैसे लोगों कि दुनिया है, क्योंकि वहाँ कोई उसका मजाक बनाने वाला नहीं होता, वहाँ कोई उसको बात-बात पर ताने मारने वाला नहीं होता, वहाँ कोई उसको ये एहसास करवाने वाला नहीं होता कि तुम दूसरों से अलग हो ! आखिर अगर माँ-बाप रख भी लेंगे तो कब तक? सिर्फ तब तक जब तक कि वो जीवित हैं और फिर माँ-बाप के मरने के बाद उसको रोटी कौन देगा? क्योंकि किन्नर शारीरिक रूप से भी इतना सक्षम नहीं होता कि वो मेहनत करके अपना पेट भर सके! क्योंकि अच्छे खासे शरीर से तन्दरूस्त दिखने वाली हर किन्नर आन्तरिक रूप से कमजोर होती है और वो कोई भी भारी भरकम काम नहीं कर सकती, क्योंकि उनका शरीर जन्म से ही अन्दर से बिल्कुल खोखला होता है। तो इस समाज में तो जो भाई-बहन दिन-रात कमा कर लाता है उसको समय पर रोटी नहीं देते तो भला किसी किन्नर को कोई क्या रोटी देगा जो कि कुछ काम भी नहीं कर सकता। क्योंकि भगवान ने उसको उस लायक बनाया ही नहीं। अगर वो किसी किन्नर पंथ में आ जाती है तो पहले तो वो अपने गुरु के लिए माँग कर उसकी सेवा करेगी, फिर उसके चेले उसके लिए माँग कर उसकी सेवा करेंगे और फिर उसके चेले के चेले उसकी सेवा करेंगे। गुरु-चेला परंपरा के नाते ही सही, कम से कम उसको सुकून की दो रोटी तो मिलेगी। ऊपर न कोई ताने देने वाला, न कोई तंज कसने वाला! ताने देगा भी कौन? सभी लोग तो वहाँ उसके जैसे होते है वो उस दर्द से गुजर चुके होते है तो उनको उस दर्द का एहसास होता है! लेकिन इस बाहरी दुनिया में उनका दर्द समझने वाला कोई नहीं। अगर किसी ने कहा कि क्या तुम्हारा भाई या बहन किन्नर है क्या? तो गुस्सा उतरेगा उस बेचारी किन्नर पर! मुझे लगता है कि कहीं न कहीं ये परंपरा बिल्कुल सही है। क्योंकि मैं खुद इस सब से गुजर चुकी हूँ।

क्या कानून बनाने से आपके समुदाय को उसका लाभ मिलेगा। अगर मिलेगा तो कैसे?
लाभ मिलना न मिलना बाद की बात है, पहले कानून तो बनाइये किन्नरों के हित के लिए! लेकिन कानून बनाने से पहले हम लोगों से पूछा जाना चाहिए कि आखिर हमें चाहिए क्या है? ये नहीं कि आप अपनी मर्जी से ही हमारे कोई भी कानून पारित कर दें! हम जानवर नहीं है कि हमसे बिना पूछे, बिना हमारा पक्ष जाने, बिना ये कि आखिर हमें चाहिए क्या है? आप कोई कानून बना दें। वो जानवर हैं वो नहीं बता सकते कि उनको चाहिए क्या है, लेकिन हम तो इन्सान है, हम तो बोल सकते हैं, हम लोगों से पूछिये तो सही! आप किसी एक किन्नर का पक्ष जानकर कोई कानून नहीं बना सकते, क्योंकि भारत में किन्नरों की संख्या 45 से 50 लाख के करीब है और सबका पेट भरने का जरिया अलग अलग है तो आपको हर वर्ग के हित को ध्यान में रखना होगा। लाभ मिलना न मिलना बाद की बात है ।

क्या आपका समुदाय अपने अधिकारों के लिए सचेत है?
कौन से अधिकारों की बात कर रहे है आप डॉ. साहब? वो अधिकार जिसमें हमें कोई भी जातिसूचक गाली दे देता है जैसे कि ‘हिजड़ा’ कहकर बोलना या फिर वो अधिकार जिसमें कोई भी हमसे भद्दे से भद्दा मजाक कर सकता है, या फिर वो अधिकार जिसमें हमें एक इन्सान ही नहीं समझा जाता? कौन से अधिकार की बात कर रहे है आप सर! कहीं आप उस अधिकार की बात नहीं कर रहे जिसमें हमारे हितों की तरफ सिर्फ इसलिए ध्यान नहीं दिया जाता क्योंकि हम वोटों कि गिनती में कम है या वो अधिकार जिसमें भारत सरकार द्वारा हमें सिर्फ इसलिए नजरअंदाज किया जाता है, क्योंकि हम संख्या में भी कम है या वो अधिकार जिसमें की कोई भी हमें सरेबाजार बेइज्जत कर दे, बावजूद उसके खिलाफ विरोध या कानूनी कार्रवाई करने की बजाय उल्टा हमारा ही मजाक बनाया जाता है ! आखिर कौन-सा अधिकार है हमारे पास जिसके प्रति हम सचेत रहें! अधिकार तो हमें किसी ने दिए ही नहीं। न इस समाज ने, न हमारी सरकार ने।

आपके समुदाय के कुछ लोग अपना जीवन बहुत अच्छा व्यतीत कर रहे हैं। क्या ये आम किन्नर के बारे में कुछ सोचते हैं?
बेशक कुछ किन्नर अपना जीवन बेहतर तरीके से व्यतीत कर रहे है, लेकिन उनका क्या जो बेचारे दर बदर भटकने पर मजबूर हैं, कुछ पूंजीपति किन्नर पूरा का पूरा जिला अकेले माँगते हैं और किसी दूसरे बेचारे गरीब किन्नर को वहाँ फटकने भी नहीं देते और अगर कोई बेचारा गरीब किन्नर अपने हक के लिए आवाज उठाता है तो इन पूंजीपति किन्नरों द्वारा या तो उसको कत्ल करवा दिया जाता है या पुलिसकर्मियों को पैसे खिलाकर उल्टा उसके ही खिलाफ तरह-तरह के मुकदमें दर्ज करवा कर उसको ही फँसा दिया जाता है या फिर पुलिसकर्मियों द्वारा उसकी पिटाई करवा कर उसको शहर से ही तड़ी पार करवा दिया जाता है। सबको एक ही नजरिये से मत देखिए जनाब। कुछ किन्नर ऐसे भी हैं जिनके पास इलाका इतना कम है कि 15-15 दिन कोई बधाई नसीब नहीं होती तो वो बेचारे अपना गुजारा कैसे करते हैं ये आप क्या जानो!

आपके समुदाय के जितने भी एन.जी.ओ. है। क्या उससे आप लोगों को कुछ लाभ होता है?
बेशक, कुछ एन.जी.ओ. या संस्थाएं किन्नरों के हकों के लिए लड़ रही हैं, लेकिन वो अभी तक ऐसा कोई काम नहीं कर पायी जिससे कि मुझे कोई संतुष्टि हो। सिर्फ अपने आपको तीसरा दर्जे का साबित करवा लेना ही कोई पूर्ण अधिकार नहीं है।

शारीरिक कमजोरी सपनों को पूरा करने में बाधा नहीं बन सकती है अगर हमारे अन्दर लगन और जतन हो तो सभी मुश्किलें आसान हो जाती हैं। क्या इससे आप सहमत हैं?
जी बिल्कुल शारीरिक कमजोरी हौसले के आगे बाधा नहीं बन सकती। लेकिन अगर हौसला होने के बावजूद उसे उसकी योग्यता साबित करने का मौका ही न मिले तो अकेला हौसला भी कुछ नहीं कर सकता। अगर मौका देना ही है तो सबसे पहले उन्हें दो जो हमारी युवा पीढ़ी योग्यता और सक्षमता होने के बाद भी बेरोजगार घूम रही है, योग्यता होने के बाद भी न जाने कितनी परीक्षा और फीजिकल पास करके भी नौकरी नहीं लग पाती और फिर वो न चाहकर भी या तो आत्महत्या कर लेते है या फिर जुर्म की दुनिया का रास्ता इख्तियार करते हैं। किन्नर तो फिर भी खुश हैं कि चलो किसी को रोजगार मिले और हमें बधाई मिले। किन्नर नाम है आत्मसमर्पण का, किन्नर नाम है उस फकीर का जो दूसरों कि खुशियों में खुश है। मुझे लगता है सबसे पहले हमारी युवा पीढ़ी को मौका देना चाहिए ताकि उनके हौसले न टूटे।

क्या किन्नरों को पूजा-पाठ करने का अधिकार है। किसी मन्दिर या गुरुद्वारा में जाकर?
बिल्कुल किन्नरों को हर मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारों या किसी भी धार्मिक जगह पर अपने-अपने धर्म के अनुसार पूजा पाठ या इबादत का करने का पूर्ण अधिकार है और हो भी क्यों न आखिर सबसे पहला और जन्म जात के फकीर जो हैं।

कुछ समय पहले किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को महामंडेश्वर की पदवी मिली है। इसे आप किस तरह से देखती हैं और उससे आपके समाज का क्या फायदा होगा?
देखिए लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जी ने अपने हक-हकूक के लिए बहुत मेहनत की है और मुझे नहीं लगता कि मुझे किसी के बारे में कोई टिप्पणी करने का अधिकार है। रही बात महामंडलेश्वर बनने की तो हो सकता है कि हमें उसका कोई सकारात्मक लाभ भी मिल सकता है।

जब आप किसी परिवार में पैदा होती हैं तो आपका कुछ और नाम होता है लेकिन जब आप घर से बाहर निकल आती है तो दूसरा नाम रख दिया जाता है। ये नाम आपको कौन देता है? क्यों नहीं आप अपने पुराने नाम पर ही जानी जाती है। क्या इसमें भी कोई कारण है?
नहीं सभी के साथ ऐसा नहीं होता कि सबका नामकरण किया जाता हो। अब मुझसे ही लगा लो । मेरा नाम मन्नू मेरा घर का नाम है और सब मुझे प्यार से मन्नू ही बुलाते थे, लेकिन मेरे गुरु जी ने मेरा नाम मनीषा रखा। लेकिन आज भी ज्यादातर लोग मुझे मन्नू महंत के नाम से ही जानते हैं। नाम बदलना इस बात का सूचक है कि अब हमें बीते दिनों में हुए हमारे परिवार या हमारे समाज के लोगों द्वारा हुए तिरस्कार को भुलाकर एक नई शुरुआत करनी होगी।

आप सबसे ज़्यादा किस किन्नर से प्रभावित हुई है और क्यों?
नहीं मैं किसी भी किन्नर से प्रभावित नहीं हूँ। अगर मैं प्रभावित हूँ तो अपनी जिन्दगी के उतार चढ़ावो से, अगर मैं प्रभावित हूँ तो मेरे साथ हुए मेरे ही परिवार या मित्रा-प्यारों के व्यवहार से, अगर मैं प्रभावित हूँ तो अपने द्वारा किये गये मेरे संघर्षों से, अगर मैं प्रभावित हूँ तो इस बात से कि मेरे अपनों जिन्हें मैंने जान से भी ज्यादा चाहा, उनके द्वारा मुझे प्यार देना तो दूर, मुझे इन्सान भी नहीं समझा इस बात से। मैं खुद को अपने अन्दर से बिल्कुल ही मर चुकी हूँ! मुझे पता है कि मेरा अपना कोई नहीं इस पूरी दुनिया में, मैं अपने साथ हुए भेदभाव और लोगों के व्यवहार से प्रभावित होती हूँ।

आप अपने परिवार में सबसे ज़्यादा किसको याद करती हैं और क्यों?
मैं सच बताऊँ तो मैं अपने परिवार के किसी एक सदस्य को नहीं बल्कि सभी को याद करती हूँ, मेरे लिए मेरे परिवार के सभी सदस्य महत्त्वपूर्ण हैं और सभी एक समान ही प्यार करती हूँ।

आप आज तक सबसे ज्यादा खुश कब हुई थीं?
मुझे अभी तक खुद याद नहीं आ रहा कि मैं आखिरी बार कब खुश हुई थी। मुझे नहीं लगता कि किस्मत ने मुझे कभी वो खुशी दी है जिसको मैं हमेशा याद रख सकूँ। मैंने जिन्दगी में सिर्फ आँसू बहाना सीखा है!

अपने तीज-त्यौहार के बारे में कुछ बताइये?
हमारे तीज त्यौहार वही हैं जो आप मनाते हो। हमारा कोई विशेष त्यौहार नहीं होता। सभी किन्नर अपने-अपने धर्म और जाति के अनुसार त्यौहार मनाते हैं।

क्या आप भारत सरकार/राज्य सरकार से कुछ कहना चाहती हैं?
59. मैंने अपने सवालों और जवाबों में बहुत कुछ कहा है। मुझे लगता है अगर कोई परिवर्तन आना होगा या हमारी भारत सरकार या राज्य सरकार कोई परिवर्तन लाना चाहती होगी तो उनके लिए इतना ही बहुत है।

क्या किन्नरों में भी आर्थिक रूप से निम्न, मध्य और उच्च वर्ग होता है?
जी बिल्कुल किन्नरों में में भी निम्न, मध्य और उच्च वर्ग होते हैं ।

क्या आप लोगों को प्रत्येक क्षेत्रा में आरक्षण मिलना चाहिए?
जी बिल्कुल किन्नर समाज को प्रत्येक क्षेत्रा में एवं प्रत्येक विभाग में आरक्षण मिलना चाहिए। अब किन्नर समाज उस आरक्षण का लाभ किस तरह से लेता है और लेता भी है या नहीं वो उन पर निर्भर है। लेकिन आप तो अपनी तरफ से ये कार्य कीजिए। बहुत से किन्नर है जो इस लाभ का फायदा उठाना चाहते है और कामयाबी की एक नई इबारत लिखना चाहते है।

क्या आरक्षण मिलने से आपके समाज का उत्थान हो पायेगा?
जी बिल्कुल हो पायेगा। बस कोशिश है तो एक शुरुआत करने की। जो हमारी भारत सरकार या राज्य सरकार की जिम्मेदारी है ।

क्या आप लोगों को चलने-फिरने और ताली बजाने का प्रशिक्षण दिया जाता है?
जी नहीं! किसी भी तरह का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। बल्कि फूटी किस्मत और समय की मार सबकुछ सिखा देती है। चाल-ढाल और व्यवहार हर व्यक्ति में जन्म से ही होता है। आप फिल्मी सितारों की तरह एकि्ंटग एक सीमित समय तक कर सकते हैं! न कि हमेशा और हर पल। हमें घुघरूं बजाना सिखाया नहीं जाता बल्कि हमारे अपनों के द्वारा ठुकरा दिए जानें के कारण और जिस समाज में हम पैदा हुए उसी समाज के ताने हमें सबकुछ सिखा देते है।

आप समाज को कोई संदेश देना चाहती हैं?
मेरी तरफ से समाज को संदेश नहीं बल्कि हाथ जोड़कर निम्र निवेदन है कि कृपया करके किन्नरों को भी इन्सान समझो। उन्हें भी अपने भाई-बहन की तरह ही आदर और सम्मान दीजिये। सिर्फ बधाई या नेग देना ही काफी नहीं, उन्हें अपनापन और प्यार भी दीजिये। वो फकीर है और हमेशा आपका भला चाहते है। मैं मानती हूँ कि कई बार बधाई या नेग को लेकर छोटी-मोटी नोंकझोक हो जाती है, लेकिन इन बेचारों के पास इसके सिवाय कोई और साधन भी तो नहीं है ना आय का। वो आपको और आपके परिवार को अपना समझते है तभी तो आपसे अधिकार से कुछ भी माँग लेते है और अगर आप उनको और कुछ नहीं तो कम से कम सम्मान ही दे दीजिये।


सम्पर्क-

मनीषा महंत, गद्दीनशीन गुरु, गाँव-भुना, तहसील-गुहला, जिला-कैथल, हरियाणा-136034

डॉ. एम. फीरोज अहमद, सम्पादक- वाड्मय पत्रिका, 205-ओहद रेजीडेंसी, दोदपुर रोड, अलीगढ़-202002 डॉ. मो. शमीम, असि. प्रोफेसर-अंग्रेजी, हलीम मुस्लिम पी.जी. कॉलेज, चमनगंज, कानपुर- 2080001

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