वाङ्मय त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका - जुलाई २०१४

6 जुल॰ 2014, 12:54 am द्वारा वाङ्मय बुक्स, अलीगढ़ प्रेषित   [ 6 जुल॰ 2014, 1:07 am अपडेट किया गया ]
अनुक्रम
  • सम्पादकीय
  • अपवित्र आख्यान: मुस्लिम (अल्पसंख्यक) समाज की पीड़ा - सतीश कुमार
  • प्रेमचंद की कहानियों में मनोवैज्ञानिक संदर्भ - भारती
  • सुपर हाइवे बनाम ज़ीरो रोड - डा. संजीव कुमार जैन / डा. वारिश जैन
  • नासिरा शर्मा की कहानियों में राजनीतिक बोध - यशवंती
  • चंद्रकांत देवतालेकृत पत्थर फेंक रहा हूँ में व्याप्त समाज - कमल
  • रैदास के साहित्य में लोकमंगल की भावना: एक अध्ययन - दुर्गा खत्री
  • स्त्री-विमर्श: एक अध्ययन - अशोक कुमार
  • वरूण ग्रह की धरती पर: एक मूल्यांकन - डा. प्रदीप लाड़
  • समकालीन परिवेश में राजेश जोशी का योगदान - उर्मिला देवी
  • अज्ञेय, मुक्तिबोध और सर्वेश्वर: कितने दूर, कितने पास - अरुण प्रसाद रजक
  • स्त्री-विमर्श और हिन्दी साहित्य - दिनेश कुमार
  • प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि पर गाँधीवाद का प्रभाव - डा. सरिता रानी
  • उपेन्द्रनाथ अश्क: एक बहुरंगी व्यक्तित्व - विकेश कुमार मिश्र
  • आधुनिक युग के शैक्षणिक क्षेत्र में भारतीय नारी के आदर्श - एन. मोहना / डा. शशि प्रभा जैन
  • आदिवासी विमर्श - डा. तसनीम पटेल
कहानी / व्यंग्य / कविता / समीक्षा 
  • एक और औरत का वेश्या होना - इंदुमति सरकार
  • तस्वीर पर चढ़े फूल - फरहा सईद
  • कोयला भई न राख - डा. हस्सान आज़मी
  • आकाश हो गई, स्वार्थ - देवेन्द्र कुमार मिश्र
  • मैट्रिक फेल-बी.ए. पास करे - केवल गोस्वामी
  • औरतों की दुनिया का सच - डा. शिवचंद प्रसाद
  • साहित्य और समाज के लोकतांत्रिककरण की प्रक्रिया का नया आख्यान - सुनील यादव
  • मुस्लिम विमर्श: साहित्य के आईने में - रमाकांत राय

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वाङ्मय बुक्स, अलीगढ़,
6 जुल॰ 2014, 12:54 am
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