वाङ्मय आदिवासी विशेषांक - १

05/02/2014, 10:35 pm द्वारा वाङ्मय बुक्स, अलीगढ़ प्रेषित   [ 06/07/2014, 1:11 am अपडेट किया गया ]
Vangmay adivasi visheshank 1
अनुक्रम 
  • सम्पादकीय 
  • समकालीन आदिवासी उपन्यासों की दशा व दिशा - श्रीप्रकाश मिश्र
  • एक उलगुलान की यात्रा कथा - डा. आदित्य प्रसाद सिंहा
  • आदिवासी जीवन में वनों का महत्त्व - डा. सुरेश उजाला 
  • रेगिस्तान का लोकरंग - प्रो. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी
  • मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ अर्थात् जारी है शिव का कंठ नीला... - मूलचन्द सोनकर
  • साहित्य के विमर्श में आदिवासी समाज - बिपिन तिवारी 
  • आदिवासी समाज का जीवंत दस्तावेज: आमचो बस्तर 69 - डा. तारिक असलम ‘तस्नीम’
  • जंगल की गुहार: धपेल - डा. दया दीक्षित 
  • सागर लहरें और मनुष्य: नारी की भटकन का उपाख्यान - डा. रामशंकर द्विवेदी 
  • डूब और पार होने की व्यथा-कथा - प्रभाकर सिंह 
  • आदिवासियों का जमीनी राजनीतिक संघर्ष - केदार प्रसाद मीणा
  • आदिभूमिः धारदार लड़ाई का भोथरा अंत - श्याम बिहारी श्यामल
  • अंधेरे में भटक रही ज़िंदगियों में रोशनी भरने की कामयाब कोशिश - डा. श्रीकांत सिंह
  • कचनार: एक समीक्षात्मक अध्ययन - प्रेमशंकर सिंह
  • अल्मा कबूतरी में जनजातीय जीवन - डा. रमाकांत राय 
  • आदिवासी जीवन की मर्म-कथा: वन के मन में - डा. जागीर नागर 
  • मानवीय संदर्भों की कहानी: काला पादरी - डा. संजीव कुमार जैन 
  • हिन्दी उपन्यासों में आदिवासी जीवन की अभिव्यक्ति - राजेश राव 
  • आदिवासियों की वेदना एवं चेतना का नया पाठ - सुन्दरम् शांडिल्य

Keywords : Vangmay traimasik hindi patrika, Adivasi Visheshank - 1, Vangmay Books, Aligarh
Comments